बच्चों में सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करने के उपाय।

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Synopsis

क्या आप अपने बच्चो में सकराकत्मक दृष्टिकोण विकसित करना चाहते है? अगर इसका उत्तर हाँ है, तो इन उपायो का पालन करें।

नौ महीने इंतजार करने के बाद जब दंपति को को यह पता चलता है, कि वह अभिभावक बनने वाले हैं तो एक क्षण के लिए उन्हें यह विश्वास नहीं होता कि यह सच है, पर जब वे इस बात को महसूस करते हैं, तो बहुत रोमांचित हो जाते हैं। उनकी जिंदगी में वह पल माता पिता की जिंदगी में वह सबसे सुनहरे पल होते हैं।

बच्चों का होना बहुत उत्साह और उल्लास लेकर आता है, लेकिन साथ-साथ बहुत सारी जिम्मेदारियां भी लाता है। इन जिम्मेदारियों को समझने के लिए ऐसा कोई ट्रेनिंग स्कूल नहीं है, जो यह सिखाता हो कि बच्चों को कैसे बड़ा करना है, कैसे पालना है? इसके बारे में लोग अपने घर के बुजुर्गों से, किताबें पढ़कर या आर्टिकल्स पढ़कर उनके जरिए जानकारी इकट्ठा करते हैं। जैसे जैसे बच्चे बड़े होते हैं, वह बाहर की दुनिया की परेशानियां से जूझते है और उन्हें उन परेशानियां का सामना करना पड़ता है। इसलिए उनको यह सिखाना बहुत जरूरी है कि वह इन चुनौतियों से कैसे सही तरीके से निपट सकें, या डील कर सकें। बच्चे जब भी कुछ खराब परिस्थितियों का सामना करते हैं तो कई बार वह बहुत दुखी हो जाते हैं और नकारात्मक सोच से वशीभूत हो जाते हैं। कठिन परिस्थितियों का सामना करते समय बच्चे कभी कभी बहुत दुखी हो जाते हैं और नकारात्मक महसूस करते हैं, इसलिए माता-पिता का यह कर्तव्य है कि बच्चों को सभी परिस्थितियों में सकारात्मक बने रहने के लिए मार्गदर्शन करें।

सकारात्मक सोच विकसित करने के लिए कुछ पेरेंटिंग युक्तियां निम्नलिखित हैं –

1. स्वयं के बारे में नकारात्मक कहने से बचें।

कम आत्मविश्वास वाले लोग अक्सर अपने बारे में नकारात्मक बोलते हैं। उनको इस बात का एहसास नहीं होता कि वह अपने बारे में नकारात्मक बातें कहते हैं। उनके बच्चे भी इस बात को उनसे सीख लेते हैं और अपने व्यवहार में गलतियां ढूंढना शुरू कर देते हैं। यह आदत बच्चों को निराशावादी बना देती है, इसलिए माता-पिता को इस आदत से बचना चाहिए।

बच्चों में सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करने के उपाय।

2. हमें अपना व्यवहार मुखर बनाना चाहिए।

एक दृढ़ व्यक्ति वह व्यक्ति है जो लोगों से निपटने में आत्मविश्वास से भरा होता है, और वह जो कहता है वही करता है। वह दूसरों की बातों को बिना सोचे समझे मानता नहीं है। वह यह कहने की हिम्मत कर रखता है कि वह क्या चाहता है और क्या महसूस करता है। अगर माता-पिता अपने स्वभाव में यह आत्मविश्वास रखते हैं तो बच्चे उनसे सीख कर मुखर बनकर जरूर आत्मविश्वास ही हो सकते हैं।

3. माता पिता को चाहिए कि अपने बच्चों की सोच को दृढ़ बनाने के लिए उन्हें प्रोत्साहित करें।

हर व्यक्ति के लिए वह खुद अपने आप में सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है, यह बात माता पिता को अपने बच्चों को अच्छी तरह से समझा देना चाहिए। इससे बच्चों में आत्मविश्वास पैदा होता है और उनकी सोच सकारात्मक बनती है।

कभी-कभी जब बच्चे अपने माता पिता के निर्देशों का पालन नहीं करते हैं, तो माता-पिता को इस बात का बुरा लगता है।

लेकिन अभिभावकों को यह समझना चाहिए कि बच्चे हमेशा अभिभावकों के आदेशानुसार कार्य नहीं कर सकते या सोच सकते हैं। इसलिए अभिभावकों को अपने बच्चों को यह सिखाना चाहिए कि हमेशा दूसरों की बात को मानना आवश्यक नहीं है, और उन्हें दूसरों की अपेक्षाओं के अनुसार जीने की भी आवश्यकता नहीं है। वह उनका अपना जीवन है जो वह अपनी सोच और ख्वाहिशों के हिसाब से चल सकते हैं।

4. बच्चों को कुछ अन्य वैकल्पिक विकल्पों पर भी काम करना सिखाएं।

कभी-कभी बच्चे अपनी समस्याओं में फस जाते हैं और उसका समाधान भी नहीं ढूंढ पाते तो वह निराश हो जाते हैं। उस समय माता पिता को उन्हें यह समझाना चाहिए कि समस्याओं को सुलझाने के लिए कुछ अन्य तरीके भी अपनाएं जा सकते हैं और उनको यह सिखाना चाहिए कि उन विकल्पों को कैसे अपनाया जा सकता है।

5. बच्चों को इस बात का विश्वास दिलाएं की परिस्थितियां बदल जाती हैं।

बच्चे जब बुलीइंग, सामाजिक बहिष्कार, असफलताएं जैसी समस्याओं का सामना करते हैं तो वह निराश हो जाते हैं। इनसे निपटने के लिए माता-पिता बच्चों को यह सलाह दें कि हालात हमेशा एक जैसे नहीं होते हैं, वह बदलते रहते हैं और कुछ समय के बाद सब कुछ ठीक हो जाता है। इसलिए अपनी परिस्थितियों को लेकर वह निराश ना हो और अपने अच्छे समय के लिए धैर्य पूर्वक इंतजार करें।

6.बच्चों के अंदर समस्या सुलझाने का कौशल विकसित करें।

माता पिता बच्चों को उनकी समस्याएं हल करने का और समाधान निकालने के लिए प्रोत्साहित करें। उन्हें यह प्रशिक्षण दें कि वह अपनी समस्याओं को कैसे सुलझा सकते हैं, जब बच्चे अपनी समस्याएं खुद सुलझाने लगते हैं तो उनके मन में निराशावादी दृष्टिकोण खत्म हो जाता है और वह कभी भी किसी कार्य को बीच में नहीं छोड़ते। माता-पिता को बच्चों को यह भी बताना चाहिए कि हर समय मजबूत होने की आवश्यकता भी नहीं है। कभी-कभी अगर वह अपनी समस्याओं में फस जाते हैं और अपने अच्छे प्रयासों के बावजूद भी वह उसमें सफल नहीं होते तो वह अपनी कमजोरी के लिए शर्मिंदा ना महसूस करें और दूसरों से मदद मांगने में भी शर्मिंदगी ना महसूस करें। ऐसा कोई इंसान नहीं है जो पूरी तरीके से पर्फेक्ट हो इसलिए हमेशा एक दृढ़ विश्वास होना आवश्यक नहीं है। बल्कि इस बात पर भी विश्वास करना चाहिए कि कभी-कभी हम कमजोर भी हो सकते हैं।

7. जीवन में संतोष का महत्व समझाना अति आवश्यक है।

बच्चों को यह सिखाना चाहिए कि कैसे दूसरे लोग अपने जीवन में दृढ़ संकल्प रखते हैं। दूसरों की जिंदगी को दिखाकर यह समझाएं कि उनके पास जो है उसको पाकर वह कैसे खुश रहते हैं। उनके बच्चे भी उनकी अपनी जिंदगी में जो भी उनके पास है उसमें वह कैसे खुश रहे और कभी भी उनके पास जो नहीं है उसके लिए दुखी ना हो। बल्कि अपने जीवन में जो है उसका ही आनंद ले।

8.नियमित रूप से व्यायाम करें, खाएं और अच्छी तरह से सोएं।

रात में ली गई अच्छी नींद के साथ हर दिन व्यायाम करना और एक संतुलित आहार लेना, माता-पिता की ओर से बच्चों के लिए सबसे अच्छा उपहार हैं।

9. डायरी लिखें।

डायरी लिखना एक आर्ट है। कुछ घटनाएँ जो किसी की जिंदगी मे खास हो, उन्हे अपनी किसी ऐसी जगह लिखना जिसे वह किसी और के साथ शेयर नहीं करेगा, इसी को डायरी लिखना कहते हैं।

यह डायरी पर्सनल भी हो सकती है या फिर वह कोई अपनी इच्छा से औरों के साथ शेयर भी कर सकते हैं। बच्चे डायरी लिखकर अपने दिन-प्रतिदिन विचार, भावनाओं, विचारों, चिंताओं, उपलब्धियों और निराशाओं को ट्रैक कर सकते हैं। यह बच्चों को उनकी समस्या के समाधान को सकारात्मक तरीके से समझने में मदद करता है।

10. खुद को एक उपहार दें।

आत्म-सम्मान और आत्म-प्रेम की भावना विकसित करने के लिए, बच्चों को कभी-कभी खुद को कुछ उपहार देने का अभ्यास करना चाहिए।

उपरोक्त विधियों द्वारा हम बच्चो मे आत्मसम्मान की भावना को विकसित कर सकते है।

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