अकॉर्डिंग टू रिसर्च साइंटिस्ट का मानना है कि जीरो टू ट इयर्स तक बच्चों को बिल्कुल भी स्क्रीन देखने ना दे। उनको किसी से वीडियो चैट कराना भी हो तो वह भी हाई क्वालिटी स्क्रीन पर थोड़ी देर के लिए करा सकते हैं। लेकिन उनको मोबाइल देना बिल्कुल मना है। उसके बाद टू टू फव इयर्स तक उनको कोई भी स्क्रीन वन आवर से बियोंड नहीं देखने देना चाहिए और फाइव इयर्स के बाद उनको कितनी स्क्रीन देखनी है यह फैमिली को डिसाइड करना चाहिए। क्योंकि स्क्रीन टाइम कम से कम होना चाहिए और यह हर ऐज के बच्चों के लिए रेकमेंडेड है।
इस ब्लॉग में हम लोग डिस्कस करेंगे कि यह सब जानते हुए भी पेरेंट्स क्यों नहीं अपने बच्चों को स्क्रीन से दूर रख पा रहे हैं और वह रेकमेंडेड टाइम के बियोंड देखते हैं। इस ब्लॉग में यह भी डिस्कस करेंगे कि पेरेंट्स क्या कर सकते हैं जिससे कि बच्चों को हम एक्सेस स्क्रीन देखने से बचा सके।
स्क्रीन ज्यादा देखने के नुक्सान :
फिजिकली इनएक्टिव होना :
सबसे पहले जानते हैं कि स्क्रीन ज्यादा देखने के नुकसान क्या हो रहे हैं। जिस समय बच्चे कुछ भी स्क्रीन पर देख रहे हैं तो उस समय नेचुरल है कि कोई फिजिकल एक्टिविटी नहीं कर रहे हैं, बल्कि एक ही जगह बैठे हैं। इसका सबसे बड़ा नुकसान यही है कि बच्चों की फिजिकल एक्टिविटी कम हो जाती है क्योंकि ग्रोइंग एज में जब उनकी फिजिकल ग्रोथ भी हो रही है और ब्रेन भी डेवलप हो रहा है, उस समय उनका फिजिकली एक्टिव होना उनकी हेल्थ के लिए बहुत जरूरी है।
स्लीप पैटर्न का चेंज होना :
सेकंड उनका स्लीप पैटर्न भी चेंज हो जाता है। जब बच्चे स्क्रीन ज्यादा देखते हैं तो उनको देर से नींद आती है और कई बार टीनेजर्स स्क्रीन देखने की वजह से बहुत देर तक जागते रहते हैं और फिर वह लेट उठते हैं। इसका नुकसान उनकी हेल्थ पर ओवरऑल पड़ता है।
एकेडमिक परफॉर्मेंस पर इफ़ेक्ट :
नेचुरली जब बच्चे स्क्रीन पर ज्यादा समय दे रहे हैं तो वह पढ़ाई पर कम ध्यान देंगे जिसका सीधा असर उनकी एकेडमिक परफॉर्मेंस पर तो पड़ेगा ही। उनका एकेडमिक परफॉर्मेंस भी कम अच्छा हो जाएगा और जब वह पढ़ने बैठते हैं तो उनका माइंड भी थोड़ा ज्यादा डिस्ट्रैक्टेड होता है। जो प्रोग्राम वो देख रहे हैं उसके बारे में भी वो कुछ ना कुछ तो सोचते ही रहते हैं।
साइकोलॉजिकल इफ़ेक्ट :
बच्चों पर स्क्रीन देखना का कुछ साइकोलॉजिकल असर भी होता हैं जैसे तरह-तरह के प्रोग्राम्स होते हैं कुछ प्रोग्राम का असर उनके ऊपर बहुत पड़ जाता है क्योंकि वह इतनी छोटी एज के हैं और इनएप्रोप्राएट चीज़े देखने से या इंटेंस प्रोग्रमम देखने से वो बहुत सैड हो जाते है कभी कभी डिप्रेशन होने लगता है या इर्रिटेशन भी होने लगता है।
चाइल्ड पैरेंट रेलशनशीप पर भी असर पड़ता है :
इसी तरह से पेरेंट चाइल्ड कम्युनिकेशन पर भी इसका असर पड़ता है। जब बच्चे अपने प्रोग्राम्स को देख रहे हैं तो वह उस समय अपने पेरेंट से बात नहीं करना चाहते हैं। धीरे-धीरे पेरेंट और चाइल्ड के बीच बातचीत कम होने लगटी है जिसका नेगेटिव असर बच्चों पर पड़ता है। एक जो हेल्दी रिलेशनशिप बनना चाहिए वोह भी बनने में प्रॉब्लम होती है। वह लोग अक्सर तभी बात करते हैं जब कोई जरूरत होती है.
इतने सारे हार्मफुल इफेक्ट जानने के बाद भी पेरेंट्स अब अपने बच्चों के स्क्रीन को कम नहीं कर पा रहे हैं। उसका कारण क्या है?
पेरेंट्स के पास टाइम की कमी :
उसका कारण यह है कि आजकल पेरेंट्स के पास टाइम नहीं है और वह खुद भी मानते हैं कि उनके पास इतने सारे काम हैं कि वह बच्चों के साथ इस तरह से इवॉल्व नहीं हो सकते। जब पेरेंट्स बिजी होते हैं उस समय वह मोबाइल पकड़ा देते हैं और उनका काम हो जाता है।
पेरेंट्स में पेशेंस की कमी:
जैसे घर में कोई आया है मदर बहुत बिजी है तो बच्चे उस समय अगर डिस्टर्ब कर रहे हैं कोई टंट्रम कर रहे हैं, अब मदर के पास तो टाइम है नहीं तो उसने उस समय उसको मोबाइल दे दिया। बच्चा उसमें इवॉल्व हो गया और और मदर का काम हो गया। इसी तरह से बच्चे कई बार खाना नहीं खा रहे होते हैं या पढ़ नहीं रहे होते हैं तो उस समय भी पेरेंट्स ऐसा कहते हैं कि कर लो तो हम तुम्हें मोबाइल दे देंगे। तुम्हें यह प्रोग्राम देखने को दे देंगे और उस लालच में बच्चे पढ भी लेते हैं खाना भी खा लेते हैं।
मोबाइल- एक शॉर्टकट :
ये रीजंस होते हैं तब जब पेरेंट्स के पास टाइम नहीं है और उनको यह शॉर्टकट लगता है कि उनको मोबाइल दे दिया और बच्चे उसमें इवॉल्व हो गए तो बच्चों का भी काम हो गया और पेरेंट्स का भी काम हो गया। लेकिन पेरेंट्स को यहां पर अवेयरनेस की जरूरत है।
इन टिप्स को फॉलो करके आप बच्चों में मोबाइल की लत को कम कर सकते है :
1)आपने अपना काम करा लिया और बच्चों का भी काम हो गया लेकिन इसका असर कितना गलत पड़ा यह आप इमेजिन करिए कि आपके पास एक तराजू है, एक तरफ बच्चों के हार्मफुल इफेक्ट हैं जो एक्सेस स्क्रीन से पड़ रहा है दूसरी तरफ आपका काम या किसी गेस्ट का आना या बच्चों का खाना ना खाना, ना पढ़ना। उन चीजों का ज्यादा नुकसान हो रहा है या बच्चों के ऊपर जो एक्सेस स्क्रीन देखरहे है किसका ज्यादा नुकसान होगा। आप पाएंगे कि हमेशा वेटेज एक्सेस स्क्रीन की होती है।
2) आपका कोई भी काम उतना इंपॉर्टेंट नहीं है कि आप बच्चों को एक्सेस स्क्रीन देखने दे। पेरेंट्स आपको पेरेंटिंग स्किल्स को इतना इफेक्टिव बनाना है कि आपका काम भी हो जाए और बच्चों का स्क्रीन भी कम रहे। और यह पॉसिबल है। अगर आप थोड़ा इसके बारे में सोचेंगे, ध्यान देंगे तो यह जरूर हो सकता है।
3) बच्चों के लिए मोबाइल देखना एक प्लेजर की एक्टिविटी है अगर इस प्लेजर की एक्टिविटी को दूसरी किसी प्लेजर की एक्टिविटी से चेंज कर देते हैं तो बच्चे उसमें भी एंजॉय करेंगे। आप देखिए कि बच्चों को आप मोबाइल के अलावा किन चीजों में खुशी दे सकते हैं। आपने देखा होगा कि बच्चों को आपके साथ बात करना अच्छा लगता है, आपसे स्टोरी सुनना अच्छा लगता है। सपोज आप किचन में काम कर रहे हैं तो आप अपने साथ बच्चों को बुला ले और कोई स्टोरी सुना सकते हैं।
4) उनको इन कामों में भी थोड़ा बहुत एंगेज कर सकते हैं। हो सकता है बच्चों को आपके साथ बाहर घूमना अच्छा लगता हो, आपके साथ कोई गेम खेलना अच्छा लगता हो तो आप उनके साथ इस तरह के काम करिए जिससे कि वह उनका ध्यान स्क्रीन से हट के उस गेम में या घूमने में या आपसे बात करने में डाइवर्ट हो जाए। इससे उनका स्क्रीन टाइम कम हो जाएगा।
लेकिन पेरेंट्स आप कहेंगे कि इतना टाइम तो हमारे पास है नहीं तो आपको समझना यह पड़ेगा कि पेरेंटिंग कोई शॉर्टकट नहीं है और ना यह इजी एक्सपीरियंस है. ये एक चैलेंजिंग एक्सपीरियंस है क्योंकि आपको अपने बच्चों को रेज करना है
उनको हेल्दी बनाना है, उनको करियर में अच्छा बनाना है और आप चाहते हैं कि उनके अंदर हर तरह के गुड बिहेवियर के स्किल्स डेवलप हो। जब आपको इतनी चीजें चाहिए तो आपको कुछ पे भी करना पड़ेगा। ऐसा नहीं होगा कि आप चाहते तो सब कुछ पाना है पर आप उसके लिए हार्ड वर्क नही करना चाहते, ऐसा नहीं हो सकता। आप अगर बिजी हैं जो कि डेफिनेटली आजकल सभी पेरेंट्स बिजी होते हैं तो आपको कुछ अरेंजमेंट्स ऐसे करने पड़ेंगे ताकि आप बच्चों को ज्यादा टाइम दे सके। जैसे अगर आपके पास डोमेस्टिक हेल्प है लेकिन वो कम है तो आप उनको बढ़ा लीजिए ताकि वह टाइम आपका सेव हो और वह टाइम आप बच्चों को दे सके और अगर आप वर्किंग वुमेन है बच्चों के साथ आप घर पर नहीं ज्यादा टाइम दे सकते हैं तो आप मेक श्यर करें कि ऐसा केयरटेकर हो जो बच्चों की आपके अकॉर्डिंग देखभाल करें। यानी कि ऐसा ना करें कि वह मोबाइल दे दे और वह भी अपने काम में बिजी हो जाए। वह टाइम बच्चों को दे बच्चों के साथ एक्टिविटीज में इवॉल्व हो ताकि बच्चे स्क्रीन की तरफ अट्रैक्ट ना हो।
पेरेंट जब आप यह सोचेंगे कि मुझे इस प्रॉब्लम का सलूशन निकालना है तो जरूर निकलेगा। आपको ट्राई करना पड़ेगा। नई नई चीजें एक्सप्लोर करनी पड़ेंगी ताकि आपकी यह सिचुएशन कि बच्चे बहुत स्क्रीन देख रहे हैं वह दूर हो। आपको यह याद रखना चाहिए कि यह समय जो निकल जाएगा वह वापस नहीं आएगा, अगर आप इस समय ध्यान नहीं देंगे तो आगे आने वाले समय में आप इन चीजों को फिर से ठीक कर नहीं कर पाएंगे क्योंकि कई चीजें जब बिगड़ जाती है तो उनको ठीक करना बहुत मुश्किल होता है। यह समय बहुत इंपॉर्टेंट है, तो बच्चों के लिए आपको कुछ भी करके टाइम निकालना बहुत जरूरी है कोई ना कोई जरूर होना चाहिए जिसके साथ बच्चे टाइम स्पेंड कर सके।
निष्कर्ष :
अपने बच्चों के लिए आप मेहनत करिए,, उनको टाइम दीजिए और आप देखेंगे कि आपकी यह मेहनत और हार्ड वर्क आगे चलके बहुत रिवार्डिंग होगी। तब आपको डेफिनेटली अपने ऊपर भी बहुत प्राउड होगा कि आपने ठीक से बच्चों को रेस किया और आपका हार्ड वर्क आज आपके सामने है।
मिलते हैं नेक्स्ट ब्लॉग में किसी नए टॉपिक के साथ।
