जिद्दी बच्चों को संभालना पेरेंट्स आपके लिए बहुत चैलेंजिंग काम होता है। सुबह से लेकर शाम तक डिफरेंट एक्टिविटीज में बच्चे कुछ ना कुछ जिद कर रहे होते हैं और उससे आप इरिटेट होकर उन पर चिल्लाते हैं, डाँटते हैं। लेकिन इससे कोई नतीजा नहीं निकलता बल्कि इससे बच्चे और दुखी होते हैं और आप भी परेशान होते हैं और आपका मूड खराब होता है। ऐसी ही प्रॉब्लम को आप किस तरह से स्मार्टली हैंडल कर सकते हैं हम इस ब्लॉग में डिसकस करेंगे। जिससे आप को ना केवल हेल्प मिलेगी बल्कि बच्चों से डील करने में भी मदद मिलेगी कि आप कैसे उनको हैंडल करें ताकि वह अपनी जिद करना या तो खत्म कर दें या कम कर दें।
स्टबबर्न बच्चे या जिद्दी बच्चे कौन होते हैं ?
सबसे पहले समझते हैं कि स्टबबर्न होना या जिद्दी होना क्या होता है। आपने देखा होगा कि बच्चे हर बार अपनी मर्जी से कोई काम करना चाहते हैं और इसमें कुछ भी गलत नहीं है। हर बच्चे की अपनी इंडिविजुअल सोच होती है, पसंद होती है। कुछ बच्चे ऐसे होते हैं जिनके अंदर उसका फर्म डिटरमिनेशन होता है कि मुझे तो यही करना है और उसके पीछे उनका एक लॉजिक भी होता है, कोई पर्पस होता है। अगर बच्चे ऐसा कर रहे हैं तो वह बच्चे, जिद्दी बच्चों की कैटेगरी में नहीं आएंगे।
कैसे आप जिद्दी बच्चे को एफ्फेक्टिवेली हैंडल कर सकते है:
जिद्दी बच्चे स्ट्रांग होने के साथ साथ अटेंशन सीकर भी होते है:
जिद्दी बच्चे वह होते हैं, जो कि किसी भी बात को लेकर एडमण्ट होते हैं। यह बच्चे बहुत स्ट्रांग विल पावर के होते हैं, स्ट्रांग सोच होती है। उनके अंदर लीडरशिप क्वालिटी होती है। और वह यह चाहते हैं कि मेरे ऊपर अटेंशन रहे और मेरी बात को एक्नॉलेज किया जाए, सुना जाए। इसलिए पेरेंट्स को ध्यान रखना है कि जब आप बच्चों से डील कर रहे हैं तो बच्चों की बात को आपको ध्यान से सुनना है, समझना है और वह तभी पॉसिबल है जब आप खुद शांत रहेंगे। ऐसा ना हो कि आप भी गुस्से में है या किसी कारण से आपका मूड ठीक नहीं है। किसी बात की परेशानी है तो ऐसे में बच्चों से बात करने से कोई फायदा नहीं होता है।
बच्चों की साइकोलॉजी को समझे:
जब भी आप बच्चों से बात करें तो सबसे पहले देखें कि आप खुद शांत है कि नहीं। यह बहुत इंपॉर्टेंट है क्योंकि आप जब गुस्से में होते हैं, तो जरूर कोई बात ऐसी निकलती है जो बच्चों के लिए ठीक नहीं है। उनकी ग्रोथ के लिए, उनकी साइकोलॉजी के लिए वह चीज ठीक नहीं है। बच्चों से बात करने के पहले आपका अपना मूड ठीक होना बहुत जरूरी है।
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जिद्दी बच्चों को अपनी चॉइस/ऑप्शंस में से चूज़ करने दे :
कभी-कभी ऐसा होता है कि कुछ बच्चों की जिद पेरेंट्स को मालूम होती है कि बच्चा इस जगह परेशान करेगा। सपोज कि बच्चे की आदत है कि जो भी खाना बनता है, उसको वो नहीं खाना बल्कि उसको दूसरी वेजिटेबल खानी होती है। ऐसे में अगर आपको यह मालूम है तो आप उसी से चूज कराइए कि आज क्या बनना है। आप उसको दो तीन ऑप्शंस दे दीजिए और उससे कहिए तुम डिसाइड करो कि क्या बनना है, सपोज आपने कॉलीफ्लावर और कैबेज दिया उसने कॉलीफ्लार कहा तो आप उस दिन वही कुक करिए और जिस समय खाना सर्व करिए उसको रिमाइंड कराइए कि यह तुम ही ने डिसाइड किया था, देखो यह कितना अच्छा बना है। ऐसे में बच्चे के पास ऑप्शन नहीं है कि वह जिद करें क्योंकि यह तो उसी ने डिसाइड किया था।
इसी तरह कुछ बच्चे कपड़ों को लेकर बहुत फसी होते हैं। कभी कहीं जाना होता है तो वह कुछ अपनी पसंद के ऐसे ड्रेसेस निकालते हैं जो कि उस जगह नहीं पहनना चाहिए। ऐसे में वहां पर पेरेंट्स दो तीन ऑप्शंस पहले ही निकाल के बच्चों के सामने दिखा सकते हैं कि देखो इसमें से तुम एक चूज कर लो जो तुम्हारा मन होगा वही तुम पहनना तो बच्चे के सामने जब आपने दो तीन ऑप्शंस दे दिए तो वह बच्चा उसी में से चूज करेगा उसको लगेगा उसने डिसाइड किया है।
बच्चों को कुछ ऑप्शंस देकर भी आप उनसे डिसाइड करा सकते हैं। ऐसी जिद जो रूटीन में बच्चा करता ही है और आपको पहले से मालूम है तो आप इसी तरह से उन्हें हैंडल कर सकते है।
बच्चे सुबह उठने पर कई बार स्कूल जाने के लिए मना करते हैं तो वहां पर उनकी बात को आप ध्यान से सुनिए और समझने की कोशिश करिए कि कोई इशू तो नहीं है। अगर कोई इशू नहीं है। और बच्चा केवल पढ़ना ना पड़े इसलिए वह स्कूल नहीं जाना चाहता तो वहां अगर आप यह समझाएंगे कि तुम्हें स्कूल जाना चाहिए, बड़े हो के तुम यह बनोगे, उसके क्या बेनिफिट्स होंगे तो वह बच्चा उससे रिलेट नहीं कर पाएगा। उसको यह बात समझ नहीं आएगी।
आपको क्या करना है कि जिस समय आप सोने जाते हैं, थोड़ी देर बच्चों के साथ टाइम स्पेंड करिए जब आप भी फ्री हो और बच्चों का भी फ्री हो उस समय बच्चे आपसे कुछ बात भी करना चाहते हैं और आपकी बात सुन भी लेते हैं। उस समय आप कुछ स्टोरी सुनाइए और वो स्टोरीज ऐसी हो जिनसे बच्चे रिलेट कर पाएं कि स्कूल जाने से क्या बेनिफिट होते हैं इस तरह की स्टोरीज और रियल एग्जांपल्स बता बताकर आप उसको मेंटली रेडी करिए कि स्कूल जाना अच्छा होता है। बच्चोंके साथ ऐसा नहीं है कि आप एक चीज एक बार में बताएंगे और उनको समझ आ जाएगी। ऐसा नहीं होता है, पेशेंस और कंसिस्टेंसी दोनों की रिक्वायरमेंट होती है।
बच्चों को डाँट से नहीं खेल खेल में काम करवाएँ :
कुछ काम ऐसे होते हैं, जो बच्चे नहीं करना चाहते हैं और आपको उनसे करवाना है और उनको सिखाना भी है तो वहां पर आप बच्चों के साथ मिलकर काम करिए। जैसे कि बच्चे सामान इधर-उधर फैलाते हैं और अगर आप उनसे कहेंगे कि जाओ अपना रूम ठीक करो तो वो नहीं करेंगे। वो जिद करेंगे कि मुझे नहीं करना है, उस समय आपको क्या करना है कि आप उनके रूम में जाइए और उनका सामान पिक करना शुरू करिए और उनसे आप कह सकते हैं कि चलो मिलके हम लोग इस रूम को ठीक करते हैं और देखते हैं कि पहले कौन करता है तो जब इस तरह की फीलिंग बच्चों के मन में आएगी कि मुझे अपनी मम्मा को हराना है या यह कंपटीशन होने वाला है तो वो इसको एक गेम की तरह लेंगे और वह वही काम करना शुरू करेंगे।
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कुछ रूल्स बनाये और उन्हें खुद भी फॉलो करें और उनसे भी करवाएं:
हर जगह आपको एक स्ट्रेटजी अपनानी है कि किस तरह से बच्चे आपकी बात को सुनके और मानना शुरू करें। बच्चे अगर बड़े हो गए हो और तब वह जिद्द कर रहे हैं तो वहां पर आपको बच्चों के साथ बैठ के कुछ रूल्स बना देने चाहिए और उनके साथ नेगोशिएट करना चाहिए कि मुझे यह डिसिप्लिन चाहिए क्योंकि हर चीज आप अलाउ नहीं कर सकते। अगर बच्चे इस तरह की एज के हैं तो उनके साथ बैठ के आप रूल्स बनवाए और फिर उसको फॉलो कराइए वहां आपको पेरेंट बनना है. डिसिप्लिन रखना है। बच्चों को यह भी आईडिया होना चाहिए कि उनकी कुछ बाउंड्री है , कुछ डिसिप्लिन है जो उन्हें फॉलो करना ही है।
निष्कर्ष:
इस तरह के बच्चे जो स्टबबर्न है, जिद्दी बच्चे है उनके साथ आपको डील करते समय अपने आपको काम रखना है, पेशेंस रखना और कंसिस्टेंसी रखनी है इससे आप देखेंगे कि वह बच्चे बहुत एनालिटिकल बनेंगे बहुत इंडिपेंडेंट बनेंगे और अक्सर बहुत resilient भी वही बच्चे होते हैं।
तो मिलते हैं नेक्स्ट ब्लॉग में एक नए टॉपिक के साथ तब तक इस ब्लॉग को लाइक एंड शेयर करिए और कमेंट करके बताइए कि आप कौन सी स्ट्रेटजी अपनाते हैं l
