एग्जाम स्ट्रेस/Exam Stress

exam stress
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Synopsis


लाइफ में हम लोग कई तरह के थ्रेट फील करते हैं। वह चाहे जॉब से रिलेटेड हो, हेल्थ से रिलेटेड हो, कोई फैमिली इशू हो या फिर लॉ एंड ऑर्डर की प्रॉब्लम हो। जब हम लोगों को थ्रेट होते हैं तो उससे स्ट्रेस क्रिएट होता है। ठीक उसी तरह से स्टूडेंट्स की लाइफ में भी कई तरह के थ्रेट होते है जिनमे सबसे बड़ा थ्रेट है, एग्जाम का।
एग्जाम आने वाले हैं या एग्जाम चल रहे हैं, तो उसका स्ट्रेस बच्चों पर हमेशा रहता है। यह बात अलग है कि किसी पर कम रहता है या किसी पर ज्यादा रहता है पर होता सबको है।

किसी भी तरह का जब स्ट्रेस होता है, तो बॉडी में कुछ रिएक्शंस ट्रिगर होती हैं।

Reaction in Body due to stress:

रिएक्शंस का असर फिजिकल, इमोशनल और मेंटल तीनों तरह से हो सकते है हैं और यह रिएक्शन सब आपस में इंटरकनेक्टेड होते हैं।

फिजिकल सिमटम्स:

फिजिकल symptoms अलग तरह के होते हैं। कुछ बच्चे अपनी बात को कह देते हैं , कुछ नहीं कहते हैं और अंदर ही अंदर रख के उनका यह लेवल इतना बढ़ जाता है कि कई बार यह एंजाइटी और डिप्रेशन में कन्वर्ट हो जाता है। उस समय आपका उनको सपोर्ट करना बहुत इंपॉर्टेंट है।
सबसे पहले आप फिजिकल सिमटम्स देखिए। फिजिकल सिमटम्स जो बहुत कॉमन होते हैं कि बच्चे कहते हैं कि हमें भूख नहीं लग रही है, पेट में दर्द हो रहा है या हेडेक हो रहा है। कई बार वह लेटे रहते हैं और उनका उठने का भी मन नहीं होता है। इतने टायर्ड फील करते हैं कि ऐसा लगता है, कि बहुत सारा काम करके उठे हैं। नींद आना कम हो जाती है या बहुत सोते रहते हैं। यह सारे सिमटम्स उनके फिजिकल सिमटम्स हैं जो आप देखकर समझ सकते हैं।
कभी-कभी उनका स्ट्रेस इतना बढ़ जाता है कि वो इतने नर्वस होते हैं कि उनके हाथ पैर कांपने लगते हैं। उनका हार्ट बीट बढ़ जाता है। वो जब भी एग्जाम की बात करते है या उसके बारे में सोचते है तो हम देखेंगे कि उनका हार्ट रेट बढ़ जाता हैं और वह सब फेशियल एक्सप्रेशन में दिखने लगता है। ऐसे सिम्टम्स को आप बहुत सीरियसली लीजिए और उनको उस समय सपोर्ट करने की बहुत जरूरत है, तो आप ऐसे सिमटम्स को बिल्कुल इग्नोर ना करें।

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इमोशनल सिम्टम्स:

कई बार पेरेंट्स बच्चों में इमोशनल सिम्टम्स मार्क करते हैं कि बच्चे बहुत डिमोटिवेटेड फील करते हैं और उनको फेलियर का डर बहुत तंग करता है। वह अपनी बात से भी यह शो करते हैं कि कहीं ऐसा ना हो कि मैं फेल हो जाऊं, मेरा सिलेक्शन ना हो तो मैं क्या करूंगा और उनकी सेल्फ एस्टीम भी बहुत लो हो जाती है। उनके अंदर कोई कॉन्फिडेंस नहीं रहता है। यह सारे इमोशनल सिमटम्स हैं। यह बातचीत के दौरान आप बच्चों में नोटिस कर सकते हैं। कभी वह यह सब आपसे बातचीत के दौरान भी डिसकस कर सकते है या फिर वो अपने फ्रेंड्स से भी इसे शेयर कर सकते है।

Cognitive Change सिम्पटम :

यह भी एक तरह का Cognitive Change सिम्पटम हैं। टेस्ट में कई बार बच्चे ब्लैंक हो जाते हैं, उनका पढ़ाई में कंसंट्रेशन ही नहीं होता है, बहुत नर्वसनेस फील होती है, तो यह सिम्पटम्स उनके कॉग्निटिव हैं। अगर आपको ऐसा लग रहा है कि बच्चे ठीक से रिवाइज नहीं कर पा रहे हैं, उनका पढ़ाई में मन नहीं लग रहा ह। चीजों को रिकॉल नहीं कर रहे हैं तो भी इन पर भी आप ध्यान दें।

एकेडमिक परफॉर्मेंस:

अगर क्लास टेस्ट में या रिवीजन टेस्ट में प्रिपरेशन पूरी होने के बावजूद उनका परफॉर्मेंस कम अच्छा हो रहा है तो इसका मतलब है कि उनके अंदर प्रेशर है। अगर आपको ऐसा लगे कि उनके ग्रेड्स कम हो रहे हैं, उनका मोटिवेशन भी नहीं है, या चीजों को वह टाल रहे हैं कि अच्छा मैं पढ़ लूंगा तो इस तरह की बातों में भी आपको ध्यान रखना है कि बच्चों का मोटिवेशन कम हो रहा है और उनको स्ट्रेस हो रहा है। इसकी वजह से उनका फोकस नीचे जा रहा है। उस समय आपका सपोर्ट उनके लिए बहुत जरूरी है।

बिहेवियर चेंजेज:

स्ट्रेस बढ़ने से बिहेवियर में भी चेंज आता है। कुछ बच्चे या तो बहुत शांत हो जाते हैं या वह इरिटेट होने लगते हैं या फ्रस्ट्रेट होते हैं, चिल्लाते हैं या बिल्कुल ही अकेले में बैठ जाते हैं। वो अपनी नर्वसनेस्स फिजट करते हुए दिखते हैं। कई बार मुंह में नेल्स डाल के कुछ सोचने लगते है, इस तरह के सिमटम्स बिहेवियर चेंजेज के होते हैं। उनकी ईटिंग हैबिट भी चेंज हो जाती है, या तो वह बाहर का फास्ट फूड खाने लगते हैं या बिल्कुल भूख खत्म हो जाती है। यह भी चेंजेज अगर महसूस हो रहे हैं जो बिहेवियर से रिलेटेड है, तो उस पर भी आप ध्यान दें और ऐसे चेंजेज होने पर आपको यह समझना है, कि यह बिहेवियर चेंज किस लिए हो रहा है। इस समयमें भी उनको आपके सपोर्ट की बहुत जरूरत है।

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Changes in Communication :

जब आप बच्चों से बातचीत करते हैं तो भी आप देख सकते है कि कहीं न कहीं उनकी बातचीत में कुछ चेंज आया है। वह अपनी बात को ठीक से एक्सप्रेस नहीं कर पाते हैं या अपने स्ट्रेस को कुछ ज्यादा ही ओवर वेलम होके बताते हैं। उनको नर्वसनेस फील होती है, वह वैसे बातचीत नहीं कर पाते जैसे वो नॉर्मली करते हैं। कई बार वह स्क्रीन के सामने भी बहुत देर तक बैठते हैं और आप जब उनको मना करते हैं तो वह बहुत
डीमोटिवेट होकर वहां से उठते हैं। अगर आपको यह भी सिम्पटम उनमे दिखाई देता है तो आपको उनकी काउंसलिंग करनी होगी। उनको यह कनविन्स करें कि वो एग्जाम स्ट्रेस ना ले क्योंकि उन्होंने जितनी पढ़ाई की है, उससे उनका एग्जाम अच्छा होगा और अगर नहीं भी अच्छा होता है, तो कोई प्रॉब्लम नहीं है। वह जितनी भी प्रिपरेशन करेंगे उतना रिजल्ट उनको मिलेगा ही ।
इस चीज को जब आप सेटल वे में आराम से समझाएंगे और उनको इसमें आपकी कोई एक्सपेक्टेशन नहीं दिखेगी और जब वह देखेंगे कि मेरे पेरेंट हमको जज नहीं कर रहे हैं और बल्कि सपोर्ट कर रहे हैं तो उनका स्ट्रेस लेवल कम होगा। इस समय आपको बहुत ज्यादा ध्यान देना है, कि बच्चों को समझे, उनकी प्रॉब्लम को समझे, उनसे बात करें और घर का एनवायरमेंट अच्छा रखें।
ध्यान रखे कि उनको ऐसा बिल्कुल नहीं फील हो कि एग्जाम एक बहुत बड़ी चीज है, जिससे डरना चाहिए, एग्जाम स्ट्रेस तो बिलकुल न ले। आप इस तरह से समझाएंगे और उनके साथ रहेंगे तो बच्चों के अंदर जो एग्जाम को लेके फियर है। वह धीरे-धीरे कम होगा और उनकी परफॉर्मेंस इंप्रूव होगा। सो इनका ध्यान रखें और बच्चों को सपोर्ट करें।
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Anshu Shrivastava

मेरा नाम अंशु श्रीवास्तव है, मैं ब्लॉग वेबसाइट hindi.parentingbyanshu.com की संस्थापक हूँ।
वेबसाइट पर ब्लॉग और पाठ्यक्रम माता-पिता और शिक्षकों को पालन-पोषण पर पाठ प्रदान करते हैं कि उन्हें बच्चों की परवरिश कैसे करनी चाहिए, खासकर उनके किशोरावस्था में।

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