बच्चों में मोबाइल की लत कैसे छुड़ाए?

Mobile addiction in kids
Mobile addiction in kids

Synopsis

बच्चों में मोबाइल की की लत आजकल बिल्कुल नॉर्मल हो गई है। सभी जगह देखा जाता है कि पेरेंट्स अपने काम में इतना बिजी होते हैं कि वह काम करते समय बच्चों को मोबाइल दे देते हैं और बड़े आराम से उनका काम हो जाता है। बच्चा मोबाइल पर इतना ज्यादा इवॉल्व होता है कि वह किसी भी तरह से पेरेंट्स को परेशान नहीं करता है। कहीं बाहर जाना हो या घर में कोई काम हो तो उस समय मोबाइल का ऑप्शन पेरेंट्स के लिए ईसीएस्ट ऑप्शन होता है।
बच्चे को एंगेज करने के लिए एक हद तक तो यह ठीक है पर कभी-कभी बच्चों में मोबाइल देखने की हैबिट फॉर्म हो जाती है। लेकिन जब आदत पड़ जाती है फिर उनको मोबाइल चाहिए होता है और तब पेरेंट्स उनको मना कर देते हैं और बच्चे मानते नहीं है तो ऐसे में पेरेंट्स को क्या करना चाहिए ? इस ब्लॉग में हम बात करेंगे कुछ ऐसी पेरेंटिंग टिप्स की जिसको फॉलो करके आप बच्चों में मोबाइल की लत को दूर कर सकते हैं।

मोबाइल की लत का बच्चों के डेवलपमेंट पर असर :

सबसे पहले जानते हैं कि मोबाइल की हैबिट हमें हटानी क्यों है। आपको भी आईडिया होगा कि हद से ज्यादा मोबाइल देखना से उनकी आईज पर स्ट्रेन पड़ता है और सबसे ज्यादा उनका ब्रेन डेवलपमेंट में इसका असर होता है। बच्चा जब छोटा होता है और वहां से लेकर टीनएज तक यानी कि 18 इयर्स तक ब्रेन का डेवलपमेंट होता है।
जब किसी पार्ट का डेवलपमेंट होता है तो उस पार्ट की एक्सरसाइज होना बहुत जरूरी है। मेंटल एक्सरसाइज कैसे होती है ? जब बच्चे खेलते हैं, कुछ नया सोचते हैं, कुछ क्रिएट करते हैं, इमेजिन करते हैं तब उनका डेवलपमेंट होता है। जिस समय वो मोबाइल में कोई वीडियो गेम या मूवी देख रहे होते हैं, उस समय क्रिएशन नहीं होता है। उनको आइडियाज तो बहुत आते हैं जो उनके ब्रेन डेवलपमेंट में हेल्प भी करते है। लेकिन उनकी क्रिएटिविटी नहीं निकल पाती हैं। ना तो उनकी इमेजिनेशन पावर डेवलप हो पाती है और न ही फिजिकली वह उतना एक्टिव हो पाते हैं। एक लिमिट से ज्यादा बच्चों को मोबाइल देना उनके ब्रेन डेवलपमेंट पर बहुत बुरा असर डालता है।

बच्चों में मोबाइल की लत को छुड़ाने के उपाय :

बच्चों के सामने कम से कम मोबाइल का यूज़ करें :

इसके लिए पेरेंट्स को क्या करना होगा? एक सिंपल सा एग्जांपल है कि जैसे किसी को अगर शुगर नहीं खानी है, उसको मिठाई नुकसान करती है तो उसके सामने से मिठाइयां हटा दीजिए। अगर सामने होगी तो मन होगा ही। लेकिन अगर सामने नहीं होंगी, ऑप्शन नहीं होगा तो फिर वह नहीं खा पाएंगे। ऐसे तो यह चीज तो बड़े लोगों के साथ भी होती है कि जिनको कोई चीज कंट्रोल करनी है वो उनके सामने से हटा दी जाए तभी वह अच्छा कंट्रोल कर पाते हैं। अगर सामने होगा तो उनसे कंट्रोल नहीं होता है। सेम बच्चों के साथ होता है l बड़े तो फिर भी समझते हैं लेकिन छोटे बच्चे नहीं समझते हैं l अगर उनको मोबाइल दिखेगा तो वह डेफिनेटली आपसे मांगेंगे ही।

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पहले पेरेंट्स को मोबाइल यूज़ को कण्ट्रोल करना होगा :

इसके लिए पेरेंट्स को क्या करना है कि मोबाइल का यूज बिल्कुल मिनिमम करना है। अगर आप यूज करेंगे तो बच्चों का मन तो करेगा ही। आपको सबसे पहले देखना होगा कि मोबाइल का यूज आपके लिए कितना इंपॉर्टेंट है। जैसे आजकल शॉपिंग करनी है तो मोबाइल चाहिए। कई तरह के सोशल नेटवर्किंग साइट्स में जाना है तो मोबाइल चाहिए। बात करनी है तो चाहिए ही। लेकिन इसमें से कौन सी चीजें हैं जो आप कट कर सकते हैं या आप ऐसा टाइम चूज कर सकते हैं जब बच्चे सामने ना हो। कोशिश करें कि बच्चों के सामने कम से कम या जब बहुत जरूरी हो तो ही मोबाइल का इस्तेमाल करें, अदर वाइज उसको हटा दें।

बच्चों को दूसरी एक्टिविटीज में एंगेज करें :

अब आप पूछेंगे कि अगर मोबाइल हटा दिया तो फिर बच्चे क्या करेंगे। यह भी एक क्वेश्चन है। जब मोबाइल नहीं था तब बच्चे क्या करते थे, वही करना होगा। जैसे बच्चे खेलते थे। मोस्ट ऑफ द टाइम खेलते थे या स्टोरी बुक्स पढ़ते थे, कुछ एक्टिविटीज जैसे प्लास्टर सन वगैरह लेकर कुछ बनाते थे। क्राफ्ट का काम करते थे। इसी तरह की घर की एक्टिविटीज होती थी उसमें इवॉल्व हो जाते थे और उनका टाइम आराम से पास हो जाता था। सेम चीजें आपको भी अडॉप्ट करनी है।

स्टोरी बुक्स पढ़ने की आदत डालें :

आपको मोबाइल में जो फिल्म्स दिखाते हैं, वह उनको स्टोरी बुक्स में दिखाइए। आप उनके लिए स्टोरी बुक्स लाइए और चेंज कर कर के लाइए। अगर कोई लाइब्रेरी जवाइन कर सकते हैं तो जरूर करें ताकि आप ज्यादा से ज्यादा न्यू बुक्स को ला सकें। कलरफुल स्टोरी बुक्स में भी बच्चों को उतना ही मजा आता है जितना कि मूवी देखने में आता है। आप उनके लिए बुक्स लाए और उनके साथ बैठ के उसकी स्टोरी सुनाये। उन कैरेक्टर से उनको जोड़ें और धीरे-धीरे उनके अंदर रीडिंग हैबिट डेवलप करें। यह हैबिट उनको लाइफ लोंग काम आएगी। उनके पास कभी भी बोरडम का कोई रीजन नहीं होगा।
बच्चों के साथ आप कहीं भी बाहर जाएं और अगर आप स्टोरी बुक्स ले गए हैं जो उनको पसंद है तो आपको कभी प्रॉब्लम नहीं होगी। आप अपने साथ बैग में स्टोरी बुक्स डालिए, कुछ और चीजें डाल दीजिए जैसे उसके खाने के लिए और बच्चों को स्टोरी बुक्स दे दीजिए , वह आराम से उसमें बिजी रहेंगे। इसके लिए आपको थोड़ी सी मेहनत करनी पड़ेगी कि कंटीन्यूअसली आप न्यू न्यू स्टोरी बुक्स लाते रहे ताकि बच्चा बोर ना हो और आपको यह भी समझना होगा कि उसका इंटरेस्ट किस तरह की बुक्स में आ रहा है।

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इनडोर गेम्स आउटडोर गेम्स:


स्टोरी बुक्स के साथ-साथ बच्चों को कुछ और एक्टिविटीज को उनको बताये। जैसे इनडोर गेम्स आउटडोर गेम्स , आर्ट एंड क्राफ्ट। इसमें आपको भी साथ में लगना पड़ेगा। ऐसा नहीं होगा कि आपने बच्चे को बोल दिया और वह अपने आप करेगा। चाहे तो आप उसके फ्रेंड्स को बुलाइए, उनके साथ टाइम स्पेंड कराइए और नहीं तो आप खुद भी इसमें टाइम दीजिए। अब जब आप पेरेंट्स बने हैं तो अपने बच्चों के लिए टाइम निकालना ही पड़ेगा । इससे बच्चों का इंटरेस्ट मोबाइल से हटकर बाकी एक्टिविटीज में आ जाएगा जो उनके ब्रेन डेवलपमेंट में बहुत हेल्प करेगा।

मिलते हैं नेक्स्ट ब्लॉग में किसी नए टॉपिक के साथ और कमेंट करके जरूर बताइए कि आपने कौन सी स्ट्रेटेजी अपनाई अपने बच्चों में मोबाइल की लत को छुड़ाने के लिए।

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Anshu Shrivastava

मेरा नाम अंशु श्रीवास्तव है, मैं ब्लॉग वेबसाइट hindi.parentingbyanshu.com की संस्थापक हूँ।
वेबसाइट पर ब्लॉग और पाठ्यक्रम माता-पिता और शिक्षकों को पालन-पोषण पर पाठ प्रदान करते हैं कि उन्हें बच्चों की परवरिश कैसे करनी चाहिए, खासकर उनके किशोरावस्था में।

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