सेल्फ क्रिटिकल होने से कैसे बचे

Synopsis

बच्चों को बचपन में प्यार और भरोसे के साथ पाला जाए तो उन्हें ऐसी गलतियां करने की आजादी होती है जिससे उन्हें कोई नुकसान न हो। ऐसे बच्चे बड़े होकर काफी आत्मविश्वासी होते हैं।

हम अक्सर अपने आसपास ऐसे लोग देखते है जो अपने अतीत की किसी एक असफलता से अपने को ही असफल मान लेते है।  एक बार की नाकामी को अपना भविष्य मान लेते है, वह यह आस ही छोड़ देते है की वो कभी भी भविष्य में सफल हो पाएंगे। ऐसा सोचने वाले लोग किसी न किसी बात को लेकर चिंतित और दुखी रहते हैं। और वे अपने जीवन में खुश नहीं रह पाते।  ऐसे लोगों को हम self -critics कहते हैं।

आत्म-आलोचना एक आदत  या फिर कहे सोच  है जिसमें लोग खुद को नकारात्मक और निराशावादी मानते हैं। एक बार जब कोई घटना उनके प्रतिकूल हो जाती है, तो वे सोचते हैं उनके साथ हमेश ऐसा ही होगा। तो ऐसे लोगों को आत्म-आलोचनात्मक कहा जाता है और इस प्रवृत्ति को आत्म-आलोचना कहा जाता है।

यदि आप इसके मूल कारण को समझना चाहते हैं, तो हमें समझना होगा की उनका पालन पोषण कैसे और किन परिस्थति में हुआ। कभी-कभी कुछ माता-पिता जरूरत से ज्यादा strict होते  हैं और हमेशा  बच्चों की गलतियों को notice  करते हैं और उन्हें टोकते रहते है। उनकी परवरिश में न तो कोई सौम्यता होती है है और न ही कोई दया। उनका यह व्यव्हार बच्चो के अंदर हीन  भावना पैदा हो जाती है। 

 और उन्हें लगता है की वह कभी भी कुछ ठीक नहीं कर सकते। 

न केवल माता-पिता, परिवार के अन्य सदस्य, शिक्षक या मित्र भी बच्चों के इस तरह के व्यवहार के लिए जिम्मेदार हो सकते है। 

self -criticism  के कारण लोग हमेशा किसी न किसी बात को लेकर तनाव में रहते हैं। इनका आत्मविश्वास इतना कम होता है वह कोई भी रिस्क नहीं ले पाते। वो ज्यादा कोशिश ही नहीं करते जिससे उनके caliber और skills को बहार आने का मौका ही नहीं मिल पता।  इसलिए बच्चों को comment करते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए। 

बच्चों को बचपन में प्यार और भरोसे के साथ पाला जाए तो उन्हें ऐसी गलतियां करने की आजादी होती है जिससे उन्हें कोई नुकसान न हो। ऐसे बच्चे बड़े होकर काफी आत्मविश्वासी होते हैं। और उन्हें कभी भी हीन भावना या कम आत्मसम्मान का सामना नहीं करना पड़ता है।

यदि आप चाहते है की आप self  criticised  नहीं होना चाहते , तो आप अपने भीतर स्थायी परिवर्तन लाने के लिए कुछ कदम उठा सकते हैं।

चरण 1. अपने  विचारों को note  करें जो आपके आत्म-आलोचनात्मक व्यवहार को बढ़ाते हैं-

नंबर एक कदम यह है कि आप जो भी सोच रहे हैं उसे लिख लें। लिखने से मतलब  है कि जो भी भावनाएँ आपको परेशान करती हैं और जिसके बारे में आप अपने बारे में गलत सोच रहे हैं, पूरी बात लिख लें। हालाँकि, कई लोगों  अपनी भावनाओं को लिख नहीं पाते है। हकीकत में जब आप लिखने बैठेंगे तो शायद आप को शब्द ही न मिले, इसके लिए आपकी मदद के लिए कुछ सुझाव दे रहे है जो आपकी मदद करेगा, जैसे की आप मुझे ऐसे ही पसंद है, यह मेरे साथ हुआ, मैं यह करना चाहता हूँ  और फिर उसका कारण लिखिए।   

कभी-कभी, आप कुछ देर के लिए  आप stuck हो जाए  कि आप आगे नहीं लिख पा रहे हैं, इसलिए अपने विचारों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए अपनी आँखें बंद कर लें। उन्हें समझने की कोशिश करें। लिखते रहें और जब तक आप इसे पूरा न कर लें तब तक मामले को न पढ़ें।

चरण 2. विनाशकारी विचार की पहचान करें-

जब आप अपने विचारों को लिखना समाप्त कर लें, तो उन्हें पढ़ें और देखें कि कौन से विनाशकारी विचार आपको परेशान कर रहे हैं। पता लगाएँ कि कौन सा विचार आपकी सोच को आत्म-आलोचनात्मक बना रहा है।

चरण 3. जानिए अपने विनाशकारी विचार का कारण

एक बार जब आप उस विनाशकारी विचार को जान लेते हैं जो आपको परेशान कर रहा है, तो आप उस विचार का कारण जान पाएंगे। आपको नकारात्मक सोचने का क्या कारण है?

शायद आपको याद हो कि बचपन में कोई आपको बार-बार नीचा दिखाता था। या कोई घटना हुई है जो इस तरह के विचार का कारण है।

कभी-कभी जब आप पुरानी घटनाओं को याद करने की कोशिश करते हैं, तो आपको याद नहीं आता कि असल में क्या हुआ था? तो ऐसे में आपको इसे नज़रअंदाज करना चाहिए और अपने विचारों को analyse  करना चाहिए।

अब यह सोचने की कोशिश करें कि अगर आपके किसी दोस्त के मन में भी ऐसे विचार आ रहे हों तो आप उन्हें क्या सुझाव देंगे? क्या आप उससे कहेंगे की आप दो बार fail  हुए तो आप तीसरी बार भी fail  ही होंगे। 

नहीं ऐसी बात नहीं है। आप ऐसा सुझाव किसी को नहीं देंगे। आप उसे  समझायेंगे  कि दो बार सफलता नहीं मिलने का मतलब है कि आपकी तैयारी पूरी नहीं थी। अगर आप तीसरी बार अच्छी तैयारी करेंगे और आपको सफलता मिलेगी। तो, अगर आप अपने दोस्त को ऐसा सुझाव दे सकते है तो खुद इस  क्यों नहीं अमल कर सकते। जब आप बातो  का ठीक से विश्लेषण करेंगे तो आप पाएंगे कि आप अपने बारे में गलत सोच रहे हैं। तो आगे से आप अपने लिए यह  रखेंगे 

चरण 4. आत्म-दयालु व्यक्ति के लिए आत्म-आलोचनात्मक

जब आपको अपनी गलती का एहसास हो, तो अपने आप को एक सकारात्मक विकल्प दें। आपको सकारात्मक सोचने के लिए ऐसे विकल्पों पर ध्यान दें। यह एक प्रकार का सकारात्मक मंत्र है, जिसे स्थायी परिवर्तन लाने के लिए आपको दोहराना होगा।

तो, आखिरी बात यह है कि आप अपने अंदर स्थायी परिवर्तन लाने के लिए जो भी सकारात्मक विकल्प चाहते हैं, उसका लगातार और नियमित रूप से अभ्यास करें। क्योंकि कोई भी परिवर्तन एक बार में नहीं आता है, आपको इसका लगातार अभ्यास करना होगा ताकि परिवर्तन स्थायी हो जाए।

यदि आप भविष्य में ऐसी स्थिति का सामना करते हैं, तो आप अपने आत्म-आलोचनात्मक विचारों को एक सकारात्मक मंत्र से बदलने में सक्षम होंगे। आप देखेंगे कि धीरे-धीरे आप एक Self-Compassionate व्यक्ति बन जाते हैं। अपनी गलतियों को समझकर, फिर आत्म-आलोचनात्मक विचारों का ठीक से विश्लेषण करके और उन्हें सकारात्मक विकल्पों के साथ बदलकर, आप जल्द ही खुद का एक बेहतर संस्करण बन जाएंगे।

जमीनी स्तर-

सभी को यह सलाह दी जाती है कि वे अपने विचार पैटर्न का पालन करें और यदि आप पाते हैं कि आप आत्म-आलोचनात्मक हैं, तो तुरंत अपने व्यवहार की जाँच करें। आपको ऐसे व्यवहार के कारण की पहचान करने के लिए उचित कार्रवाई करनी चाहिए। और फिर उस नकारात्मक व्यवहार को सकारात्मक में बदल दें।

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Anshu Shrivastava

Anshu Shrivastava

मेरा नाम अंशु श्रीवास्तव है, मैं ब्लॉग वेबसाइट hindi.parentingbyanshu.com की संस्थापक हूँ।
वेबसाइट पर ब्लॉग और पाठ्यक्रम माता-पिता और शिक्षकों को पालन-पोषण पर पाठ प्रदान करते हैं कि उन्हें बच्चों की परवरिश कैसे करनी चाहिए, खासकर उनके किशोरावस्था में।

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